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जब-जब होए धर्म की हानि, तब-तब धर्म रक्षा हेतु आये भगवान – पंडित मनोज शुक्ला

Written by Kamlakar Yerpude

 जब-जब होए धर्म की हानि, तब-तब धर्म रक्षा हेतु आये भगवान – पंडित मनोज शुक्ला

 

रायपुर। रविग्राम तेलीबांधा स्थित चाणक्य गुरुकुल पब्लिक स्कूल परिसर में अशोक शर्मा व संजय शर्मा परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण कथा में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक मृदुभाषी ज्योतिषी भागवताचार्य महामाया मंदिर रायपुर वाले पंडित मनोज शुक्ला जी महाराज ने आज भागवत रूपी अमृत का रसपान कराते हुए अजामिल की कथा, नरसिंह अवतार, भक्त प्रह्लाद, गजेंद्र मोक्ष व समुद्र मंथन की कथा विस्तार से सुनाई।

पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि अधर्म का नाश करने के लिए, भक्तों को तारने व दुष्टों का संहार करने एवं धर्म की रक्षा हेतु भगवान विष्णु 10 बार अलग-अलग रूपों मे अवतार लेकर आये। मनुष्य को अपने अंदर के अहंकार को दूर करना जरूरी है और अहंकार दूर होगा सच्चे मन से भगवान् का कथा श्रवण, सत्संग, भजन, भगवद् भक्ति तथा काम, क्रोध, द्वेष, घृणा को दूर करने से।

कथा व्यास पंडित मनोज शुक्ला ने भगवान नरसिंह अवतार की मार्मिक कथा बताते हुए कहा कि भक्त प्रह्लाद की भक्ति अनुकरणीय है । भक्त को भगवान की भक्ति और उनकी शक्ति पर अटुट विश्वास होना चाहिए जैसा भक्त प्रह्लाद को था। हिरण्यकश्यप नामक दैत्य ने भगवान ब्रम्हा जी को प्रसन्न करने घोर तप किया। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट होकर बोले मांगों जो मांगना है। यह सुनकर हिरण्यकश्यप ने अपनी आंखें खोली और ब्रह्माजी को अपने समक्ष खड़ा देखकर कहा-प्रभु मुझे केवल यही वर चाहिए कि मैं न दिन में मरूं न रात को, न अंदर न बाहर, न कोई हथियार काट सके, न आग जला सके, न ही मैं पानी में डूबकर मरूं, न किसी दैत्य से न किसी देवता से और न ही किसी मानव से। ब्रम्हा जी ने उसे वरदान दे दिया। हिरणकश्यप के पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को शत्रु मानते थे। उन्होंने अपने पुत्र को मारने के लिए विविध उपक्रम किये और फिर भी नही मार पाया तब उसने गदा उठाया और क्रोध में खंभा को मारा तो उस खंभे में से श्री विष्णु भगवान नरसिंह का रूप धारण करके प्रकट हुए जिसका मुख शेर का व धड़ मनुष्य का था, जिसके बड़े-बड़े नाखून थे और भगवान नरसिंह अत्याचारी दैत्य हिरण्य कश्यप को पकड़ कर उदर चीर कर उनका वध किया।

कथा व्यास पंडित मनोज शुक्ला ने आगे भक्तों को कथा का रसपान कराते हुए कहा कि जब समुद्र का मंथन हुआ तो उसमें 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। हमारा मानव शरीर भी एक सागर की तरह ही है और इस सागर रुपी मनुष्य शरीर को संस्कार रूपी मथनी से मथेंगे तो इसमें से भी सद् व्यवहार, नैतिकता, परोपकार जैसे अनेक रत्न की प्राप्ति होगी। मदराचल पर्वत को संभालने के लिए भगवान ने कच्छप अवतार लेकर पर्वत के नीचे अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को उठा लिया, उसी तरह मनुष्य भी अपने अहम भाव को दूर कर अपने शरीर को अपने मन को भगवान में लगाए तो निश्चित ही उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी और उन्हें ज्ञान हो जाएगा। फिर भगवान ने देव व दानव के मध्य अमृत बांटने के लिए मोहिनी अवतार लिए।

पंडित शुक्ला ने आगे कथा मे बताया कि एक गजराज जब पानी मे नहां रहा था तब एक मगरमच्छ ने उसके पैर को पकड़ लिया फिर गजराज ने पूरे मन से बचाने के लिए भगवान का स्मरण किया तब भगवान प्रकट हुए और मगरमच्छ को अपने चक्र सुदर्शन से काटकर गजेंद्र को मोक्ष प्रदान किया।

पुराणों मे वर्णित कथाएँ बताती है कि इस प्रकार भगवान का नाम स्मरण व भगवान की भक्ति से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शर्मा परिवार द्वारा आरती पश्चात प्रसादी वितरण किया गया।

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Kamlakar Yerpude