वरिष्ठ रंगसाधक 86 वर्षीय अनिल कालेले ने नाना पाटेकर के साथ गुजारे पलों-यादों किया साझा
रायपुर। महाराष्ट्र मंडल के वरिष्ठ रंगसाधक अनिल श्रीराम कालेले ने कहा कि गोवा से वापसी के दौरान मैं मुंबई में रुका और पत्नी अपर्णा कालेले, सात वर्षीय पुत्र जयेश और मित्र इस्माइल के साथ मुंबई के रविंद्र थियेटर पहुंचा था। वहां मराठी नाटक का मंचन होने वाला था, जिसमें नाना पाटेकर, भारती आचरेकर और विक्रम गोखले अभियन कर रहे थे। तब मैं इस्माइल को नाना से मिलाने ले गया, तो नाना ने मुझे देखकर अपनी सिगरेट फेंक दी थी।
इस्माइल ने मुझसे पूछा- नाना आपका शिष्य तो नहीं है, तो उसने आपको देखकर अपनी सिगरेट क्यों फेंक दी। इस पर मैंने कहा था, ये नाना के संस्कार हैं। मुंबई में सुप्रसिद्ध ज्येष्ठ अभिनेत्री विजया मेहता के 28 दिवसीय नाट्य शिविर में नाना पाटेकर आमतौर पर आया करते थे और मेरी उनसे लगातार हुई मुलाकातों से उन्हें ये तो पता था कि मैं रंगमंच का कलाकार तो हूं, साथ ही कॉलेज में प्राध्यापक भी हूं।
वरिष्ठ रंगसाधक कालेले ने आगे कहा, बेहद सरल और विनम्र स्वभाव के नाना पाटेकर ने अपने अलग अंदाज और अभिनय की विशिष्ट शैली से लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाई थी। ऐसा कोई किरदार नहीं था जिसे वे निभा न सकते हों। कालेले ने कहा कि नाना पाटेकर का जाना भारतीय सिनेमा की अपूरणीय क्षति है। बहुत कम अभिनेताओं के अभिनय में वह संवेदनशीलता, गहराई, विशिष्टता और दमदारी होती है, जो नाना पाटेकर में थी। नाना अपने विचारों को व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं करते थे।
70 के दशक में नाना से मुलाकात का जिक्र करते हुए अनिल कालेले ने कहा, मुंबई के रविंद्र भवन में उन दिनों 28 दिन की विशेष कार्यशाला लगी थी। जिसमें मैं विशेष रूप से शामिल हुआ था। वहां एक दिन ‘पाहिजे जातीचे’ नाटक का मंचन हो रहा था। मेरे साथ रायपुर के डॉ. आठवले भी गए थे। मैंने डॉक्टर आठवले से कहा कि चलो मैं तुम्हें नाना से मिलवाता हूं। उस समय नाना थियेटर के बड़े कलाकार हुआ करते थे। जब मैं डॉ. आठवले को साथ लेकर नाना के पास पहुंचा, तो तबीयत खराब होने के कारण उनकी आवाज नहीं निकल रही थी। मैंने उनसे कहा- आपका नाटक देखने के लिए मित्रों के साथ सुबह से टिकट निकालकर बैठा हूं। दोस्तों को आपसे मिलवाने लाया हूं और आप हैं कि आवाज नहीं निकल रही, बोलकर बैठे हो।