प्रभु श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर उनके ननिहाल में छलक रहा भारी उत्साह छत्तीसगढ़ के लोग भांजे में देखते हैं प्रभु श्री राम की छवि
डागेश यादव रायपुर_______@ एक ओर जहां आज अयोध्या में राम जन्मभूमि पर श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह को देशभर के रामभक्तों में हर्ष का माहौल है, वहीं छत्तीसगढ़ में भी उत्साह वहां से रत्तीभर भी कम नहीं है। प्रदेश के लोग अपने भांजे रामलला की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण और श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा को लेकर अत्यंत प्रसन्न है। उल्लेखनीय है कि अयोध्या की रानी एवं छत्तीसगढ़ की अस्मिता की प्रतीक माता कौशल्या के पुत्र भगवान श्री राम का भांजा के स्वरूप में प्रदेश से गहरा नाता है। इसका जीता-जागता उदाहरण है, छत्तीसगढ़ में सभी जाति समुदाय के लोग बहन के पुत्र को भगवान के प्रतिरूप अर्थात भांजा मानकर उनका चरण पखारते हैं। मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रभु श्रीराम से कामना करते हैं। यह और भी प्रबल तब होता है, जब गांव-शहर-कस्बा कहीं भी हो कोई भी जाति अथवा समुदाय के हो मांमा-भांजा के बीच के रिश्ते को पूरी आत्मीयता के साथ निभाया जाता है। मांमा के साथ किसी भांजे का यह रिश्ता कई बार माता-पिता के लिए पुत्र से भी ज्यादा घनिष्ठ
स्वरूप में दिखाई पड़ता है। त्रेतायुग में जब छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कोसल व दण्डकारण्य के नाम से विख्यात था,
तबकोसल नरेश भानुमंत थे। वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्यापति युवराज दशरथ के राज्याभिषेक के अवसर पर कोसल नरेश भानुमंत को भी अयोध्या आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर कोसल नरेश की पुत्री एवं राजकन्याकेएम
भानुमति भी अयोध्या गई हुई थीं। युवराज दशरथ कोसल राजकन्या भानुमति के सुंदर और सौम्य रूप को देखकर मोहित हो गए और कोसल नरेश महाराज भानुमंत से विवाह का प्रस्वाव रखा। युवराज दशरथ और कोसल की राजकन्या भानुमति का वैवाहिक संबंध हुआ।
विवाह के बाद कोसल क्षेत्र की राजकुमारी होने की वजह से भानुमति को कौशल्या कहा जाने लगा। अयोध्या की रानी इसी कौशल्या की कोख से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का जन्म हुआ। तभी से ममतामयी माता कौशल्या को तत्कालीन कोसल राज्य के लोग बहन मानकर अपने बहन के पुत्र भगवान श्री राम को भांजा मानते हैं और उन्हों के प्रतीक स्वरूप यहां के लोग अपने भांजे का पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं।
8वीं-9वीं सदी में निर्मित है माता कौशल्या का भव्य मंदिर _____________@ वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्मृति शेष 8वीं 9वी सदी में निर्मित माता कौशल्या का एकमात्र
भव्य मंदिर राजधानी रायपुर से 20 किलोमीटर दूर में गांव चंदखुरी में स्थित है छत्तीसगढ़ की पावन भूमि से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जननी माता कौशल्या का मंदिर पूरे भारत में एकमात्र और दुर्लभ मंदिर तो है ही यह छत्तीसगढ़ राज्य की गौरवपूर्ण अस्मिता भी है प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दृष्टि गोवर होते हैं इस मंदिर के गर्भ गृह में मां कौशल्या की गोद में बाल रूप में भगवान श्री रामचंद्र की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेते हैं
छग में भाचा श्री राम ने बिताए 10 वर्ष____@
रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणपथ कहलाता था। शोधकर्ताओं के अनुसार वनवास काल में प्रभु श्री राम चन्द्र जी के यहां आने का प्रमाण मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल के 14 वर्षों में से लगभग 10 वर्ष से अधिक समय छत्तीसगढ़ में व्यतीत किया था।
छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में देवी सीता की व्यथा, दण्डकारण्य की भौगोलिकता और वनस्पतियों के वर्णन भी मिलते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने और यहां के विभिन्न स्थानों पर चौमासा व्यतीत करने के बाद दक्षिण भारत में प्रवेश किया था। इसलिए छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ भी कहा जाता है।
चंदखुरी कौशल्या माता मंदिर में 21 से शुरू होगी पूजा 22 को महाआरती जाएगी
माता कौशल्या जन्मभूमि सेवा संस्थान के उपाध्यक्ष भारत भूषण साहू ने बताया कि 21 जनवरी की शाम से यहां भी महोत्सव शुरू हो जाएगा।
22 जनवरी को सुबह 8 बजे मंगल आरती पूजा-अर्चना के बाद । दोपहर 12 बजे जब अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा होगी, उसी समय कौशल्या माता मंदिर में महाआरती होगी। शाम 6 बजे 21 हज़ार दीपों के साथ महाआरती 108 थाली फूलों के साथ होगी
अयोध्या में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का यहां बड़ी स्क्रीन पर लाइव प्रसारण भी दिखाया जाएगा।

