अभिरक्षा में मृत्यु मानवाधिकार का उल्लंघन – भगवान
देश भर में हो रहे अभिरक्षा में मौतों को रोकने केंद्र सरकार से सख्त ‘कानून’ बनाने की मांग की
पीड़ित परिजनों को 1 करोड़ रुपए मुआवज देने की मांग
जांजगीर-चांपा / रायपुर, छत्तीसगढ़ , दिनांक 11 सितंबर 2026। जांजगीर-चांपा के चांपा थाना क्षेत्र में 30 वर्षीय युवक शिव सहिस की पुलिस अभिरक्षा (Custody) में हुई संदिग्ध मौत पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त करते हुए सामाजिक न्याय कार्यकर्ता अधिवक्ता भगवानू नायक ने इसे मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन और कानून के राज पर एक बड़ा दाग बताया है। उन्होंने कहा कि पुलिस का यह दावा कि आरोपी को मिर्गी का दौरा पड़ा, अक्सर ऐसे मामलों में सच को छिपाने की एक घिसी-पीटी कहानी जैसा प्रतीत होता है, जिसकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। अधिवक्ता भगवानू ने कहा कि देशभर में आए दिन पुलिस थानों और जेलों के भीतर हो रही आरोपियों की मौतें यह साबित करती हैं कि हमारे वर्तमान कानून (भारतीय न्याय संहिता और BNSS) कस्टोडियल टॉर्चर (Custodial Torture) को रोकने में पूरी तरह पर्याप्त नहीं हैं। सिर्फ एक कांस्टेबल को सस्पेंड कर देना या विभागीय जांच बैठाना इस व्यवस्था की बर्बरता का इलाज नहीं है।
अधिवक्ता भगवानू नायक ने केंद्र और राज्य सरकार से पुरजोर मांग की है कि भारत में कस्टोडियल हिंसा पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए एक विशिष्ट, सख्त और जवाबदेह कानून(Comprehensive Anti-Custodial Torture Law) तत्काल बनाया जाना चाहिए। इस नए कानून के तहत निम्नलिखित कड़े प्रावधान होने चाहिए, जो दोषी अधिकारियों के लिए किसी ‘कानून’ से कम न हों। उन्होंने कहा पुलिस अभिरक्षा में किसी भी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना या मारपीट को एक गंभीर गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए, और मौत होने की स्थिति में संबंधित पुलिसकर्मियों पर बिना किसी देरी के हत्या (Murder) का मुकदमा दर्ज कर तुरंत सेवा से बर्खास्त किया जाए। यदि किसी थाने के भीतर लॉकअप में कोई मौत होती है, तो जवाबदेही सिर्फ निचले स्तर के आरक्षक की नहीं, बल्कि थाने के प्रभारी और संबंधित क्षेत्र के अधिकारियों की भी तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कस्टोडियल डेथ की जांच पुलिस या उसी जिले के प्रशासन द्वारा न कराकर, एक पूरी तरह से स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी या हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता वाले न्यायिक आयोग द्वारा समय-सीमा के भीतर पूरी की जाए। अनिवार्य तकनीक और लाइव मॉनिटरिंग देश के हर पुलिस थाने के पूछताछ कक्ष और लॉकअप में अनिवार्य रूप से 24 घंटे लाइव सीसीटीवी कैमरे चालू रहें, जिसका सीधा बैकअप जिला न्यायालय और मानवाधिकार आयोग के सर्वर पर सुरक्षित रहे, ताकि पुलिस फुटेज के साथ छेड़छाड़ न कर सके।
अधिवक्ता भगवानू नायक ने अंत में कहा कि मृतक शिव सहिस के पीड़ित परिवार को न्याय हित में एक करोड़ रुपया मुआवजा दिया जाए। उन्होंने मांग की कि डॉक्टरों की टीम द्वारा की जा रही पोस्टमार्टम न्यायिक मैजिस्ट्रेट समक्ष हो और रिपोर्ट को तुरंत सार्वजनिक किया जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। जब तक देश में कस्टोडियल वायलेंस के खिलाफ एक खौफ पैदा करने वाला सख्त कानून नहीं बनेगा, तब तक गरीब और कमजोर वर्गों के नागरिक थानों के भीतर सुरक्षित नहीं रह सकते।



