छत्तीसगढ़ लोक अदालत

आपसी समझौते से 1.30 लाख का वसूली वाद समाप्त

राष्ट्रीय लोक अदालत में तत्काल सुलझा ट्रांसपोर्टिंग विवाद का मामला

जनता की अदालत है, लोक अदालत

रायपुर। राष्ट्रीय लोक अदालत के माध्यम से आपसी सहमति एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में ट्रांसपोर्टिंग विवाद का एक मामला तत्काल निराकृत हुआ और पक्षकारों को सार्थक सफलता मिली है। रायपुर न्यायालय जितेंद्र कुमार सोनवानी, इक्कीसवां व्यवहार न्यायाधीश, कनिष्ठ श्रेणी के न्यायालय में लंबित ₹1,30,000/- की वसूली से संबंधित प्रकरण का पक्षकारों के मध्य आपसी राजीनामा होने के फलस्वरूप पूर्ण एवं अंतिम रूप से निराकरण कर दिया गया।

प्रकरण में वादी अभिषेक साहू द्वारा प्रतिवादीगण के विरुद्ध ₹1 लाख 30 हजार की वसूली के लिए वाद प्रस्तुत किया गया था। न्यायालय में वादी अभिषेक साहू एवं प्रतिवादी क्रमांक-1 छोटेलाल राय अपने-अपने अधिवक्ताओं के साथ उपस्थित हुए और दोनों पक्षों की ओर से आदेश 23 नियम 3 सहपठित धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत संयुक्त राजीनामा आवेदन प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने पक्षकारों से पूछताछ एवं बयान के बाद पाया कि समझौता स्वेच्छा से, विधि-सम्मत रूप से तथा बिना किसी दबाव के किया गया है और उसमें लोकनीति के विरुद्ध कोई शर्त नहीं है।

न्यायालय ने राजीनामा आवेदन स्वीकार करते हुए उसे आदेश का अंग बनाया तथा पक्षकारों के मध्य हुए समझौते के आधार पर वाद को पूर्ण रूप से निराकृत एवं समाप्त करने का आदेश पारित किया। इसके साथ ही वाद संस्थित करते समय जमा की गई ₹15,400/- न्याय शुल्क राशि को नियमानुसार वापस करने का भी आदेश दिया गया।

इस अवसर पर खंड पीठ क्रमांक 37, सदस्य – अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा कि, “राष्ट्रीय लोक अदालत न्याय व्यवस्था की एक अत्यंत प्रभावी और जनहितकारी पहल है। वर्षों तक न्यायालयों में चल सकने वाले विवाद यदि पक्षकार आपसी समझदारी, संवाद और सहमति से समाप्त करते हैं तो इससे न केवल उनका समय और धन बचता है, बल्कि आपसी कटुता भी समाप्त होती है। लोक अदालत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां हार-जीत के बजाय दोनों पक्षों की सहमति और विवाद का स्थायी समाधान महत्वपूर्ण होता है।” खंड पीठ क्रमांक 37 सदस्य – अधिवक्ता श्रीमती इंद्राणी चौधरी ने कहा न्यायालयों में लंबित ऐसे मामले, जिनमें समझौते की संभावना हो, उनमें पक्षकारों एवं अधिवक्ताओं को राष्ट्रीय लोक अदालत का अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। इससे न्यायालयों पर लंबित प्रकरणों का भार कम होने के साथ-साथ आम नागरिकों को सुलभ, त्वरित और सौहार्दपूर्ण न्याय प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

 

 

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