रायपुर। सनातन संस्कृति, धार्मिक चेतना और सामाजिक समरसता के प्रचार-प्रसार में जुटे डॉ. पं. रूपेश महाराज ने कथावाचन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत परिवार में जन्म लेकर उन्होंने वैदिक शिक्षा, संस्कृत एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन किया और कठिन परिस्थितियों के बावजूद निरंतर साधना एवं स्वाध्याय के बल पर धर्म के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित की।
डॉ. रूपेश महाराज का जन्म रायपुर के माना बस्ती में एक सनातन संस्कारों से जुड़े परिवार में हुआ। बचपन से ही धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े रूपेश महाराज ने धर्म और सेवा के संस्कारों को अपने जीवन का आधार बनाया। शिक्षा-दीक्षा के दौरान वैदिक परंपराओं, संस्कृत और धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन किया। इसके बाद श्रीमद्भागवत कथा, रामकथा और शिवकथा के लोकप्रिय कथाव्यास के रूप में अपनी पहचान बनाई। सहज, सरल और प्रभावशाली शैली में कथा वाचन के माध्यम से वे लोगों को धर्म, संस्कार और सदाचार का संदेश दे रहे हैं।
धार्मिक गतिविधियों के साथ वे सर्वसमाज के हितों को लेकर भी सक्रिय हैं। समाज के सभी वर्गों के उत्थान, धार्मिक सद्भाव, सामाजिक समरसता और परोपकार के कार्यों में उनकी सहभागिता रही है। विशेषकर युवाओं को सनातन संस्कार, नैतिकता और कर्तव्यबोध से जोड़ने के लिए वे प्रेरित करते हैं तथा नशामुक्ति, शिक्षा और संस्कार अभियान में मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ संत महासभा में प्रदेश प्रवक्ता का दायित्व निभाते हुए वे संत समाज के विचारों और हितों को प्रमुखता से रखते हैं। इसी कड़ी में उन्हें वर्ल्ड कल्चरल एंड एजुकेशनल आॅर्गेनाइजेशन (डब्ल्युसीईओ) की ओर से नई दिल्ली में आयोजित सेमिनार में आमंत्रित किया गया।
मानद डॉक्टरेट सम्मान से नवाजा गया
1 नवंबर 2026 को रॉयल पेपर बैंक्वेट, नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में धर्म, संस्कृति एवं सामाजिक कल्याण के विषयों पर विशेष संवाद हुआ। इस अवसर पर डॉ. रूपेश महाराज को उनके धार्मिक-सांस्कृतिक योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट सम्मान से भी नवाजा गया। डॉ. रूपेश महाराज का संकल्प सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ आने वाली पीढ़ियों को संस्कारयुक्त जीवन की प्रेरणा देना है। उनका मानना है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा, सद्भाव, नैतिकता और मानव कल्याण का मार्ग भी है।