खरतरगच्छाचार्यश्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वर महाराज के शिष्य मुनिश्री सत्वरत्न सागर महाराज एवं मुनिगणों की मिलेगी पावन निश्रा
नवपद ओली की आराधना, दर्शन-वंदन व प्रवचन का पुण्य लाभ भी
रायपुर। नवकार नगर स्थित श्रीमुनि सुब्रत स्वामी जिनालय एवं मणिधारी दादाबाड़ी में 18 से 26 अक्टूबर तक नवपदजी ओली तप आराधना होगी। प्रथम दिन 300 श्रद्धालु सामूहिक रूप से आयंबिल तप करेंगे। यह आयोजन खरतरगच्छाचार्यश्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वर महाराज के शिष्य मुनिश्री सत्वरत्न सागर महाराज एवं मुनिगणों की पावन निश्रा में होगा। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से नवपद ओली की आराधना, दर्शन-वंदन व प्रवचन का लाभ लेने प्रात: 8 बजे से प्रवचन स्थल पर उपस्थित होने का निवेदन किया है।
क्या है आयंबिल तप? आयंबिल जैन परंपरा का संयम और स्वाद-त्याग पर आधारित तप है। इसमें तपस्वी सामान्यत: दिन में एक बार, एक बैठक में सादा उबला या पकाया हुआ अनाज-दाल ग्रहण करते हैं। भोजन में तेल, घी, दूध, दही, मिठास, मसाले और स्वाद बढ़ाने वाली सामग्री का त्याग किया जाता है। कंद-मूल, फल और हरी सब्जियों के संबंध में भी आराधक अपने संघ और गुरु भगवंतों की निर्धारित विधि का पालन करते हैं। पानी भी निर्धारित नियम के अनुसार लिया जाता है। इस तप का मुख्य भाव रसना पर संयम, आत्मशुद्धि और तप के माध्यम से आध्यात्मिक गुणों का स्मरण करना है। आयंबिल के नियमों में परंपरा के अनुसार कुछ भिन्नता हो सकती है।
नवपद ओली के नौ दिनों में सिद्धचक्र के नौ पदों की क्रमश: आराधना की जाती है। पहले पांच पद पंच परमेष्ठी के हैं—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु। इसके बाद सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप की आराधना होती है। प्रत्येक पद आत्मकल्याण के मार्ग में विशिष्ट गुण और प्रेरणा का स्मरण कराता है।
नौ दिन, नौ पद और उनकी विशेषता
अरिहंत पद—सफेद रंग: प्रथम दिन अरिहंत भगवान की आराधना होती है। अरिहंत राग-द्वेष जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर केवलज्ञान को प्राप्त करते हैं और धर्मतीर्थ की स्थापना करते हैं। उनसे वीतरागता और आत्मविजय की प्रेरणा मिलती है। परंपरा में इस पद के 12 गुण बताए गए हैं।
सिद्ध पद—लाल रंग: दूसरे दिन सिद्ध परमात्माओं का स्मरण किया जाता है। सिद्ध जन्म-मरण के चक्र से मुक्त, कर्मों से रहित और मोक्षपद को प्राप्त शुद्ध आत्माएं हैं। यह पद मुक्ति और आत्मा की पूर्ण शुद्धता का संदेश देता है। इसके 8 गुण माने गए हैं।
आचार्य पद—पीला रंग: तीसरे दिन आचार्य भगवंतों की आराधना होती है। आचार्य साधु-साध्वी समुदाय का मार्गदर्शन करते हैं और संघ में धर्म, अनुशासन तथा साधना की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। यह पद संयम और नेतृत्व के आदर्श की प्रेरणा देता है। इसके 36 गुण बताए गए हैं।
उपाध्याय पद—हरा रंग: चौथे दिन उपाध्याय भगवंतों का स्मरण किया जाता है। वे आगम और शास्त्रों के ज्ञाता तथा अध्यापक होते हैं, जो साधु-साध्वियों को धर्मज्ञान प्रदान करते हैं। यह पद अध्ययन, ज्ञान और उसके प्रसार का महत्व बताता है। इसके 25 गुण माने गए हैं।
साधु पद—काला रंग: पांचवें दिन साधु-साध्वी भगवंतों की आराधना होती है। वे त्याग, तप, संयम और अहिंसा के मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण की साधना करते हैं। यह पद वैराग्य और संयममय जीवन की प्रेरणा देता है। इसके 27 गुण बताए गए हैं।
सम्यग्दर्शन पद—सफेद रंग: छठे दिन सम्यग्दर्शन की आराधना होती है। सम्यग्दर्शन का भाव है—तत्त्वों और जिनवाणी के प्रति सम्यक श्रद्धा तथा सही दृष्टिकोण। यह गुण साधना-पथ पर आगे बढ़ने का आधार माना गया है। इसके 67 गुण बताए गए हैं।
सम्यग्ज्ञान पद—सफेद रंग: सातवें दिन सम्यग्ज्ञान का स्मरण किया जाता है। आत्मा, कर्म और जीवन के तत्त्वों को सही रूप में जानना सम्यग्ज्ञान का भाव है। यह पद विवेकपूर्ण ज्ञान और अज्ञान से मुक्ति की प्रेरणा देता है। इसके 51 गुण माने गए हैं।
सम्यक्चारित्र पद—सफेद रंग: आठवें दिन सम्यक्चारित्र की आराधना होती है। जाने हुए तत्त्वों को जीवन में उतारना, अहिंसा और संयम का पालन करना तथा कषायों पर नियंत्रण रखना सम्यक्चारित्र का सार है। इसके 70 गुण बताए गए हैं।
सम्यक्तप पद—सफेद रंग: नौवें दिन सम्यक्तप की आराधना के साथ ओली का समापन होता है। तप का उद्देश्य आत्मसंयम, इच्छाओं पर नियंत्रण और कर्मनिर्जरा की भावना को पुष्ट करना है। इसके 50 गुण माने गए हैं।
पदों के रंग और गुण-संख्या सिद्धचक्र आराधना की प्रचलित परंपरा के अनुसार हैं; अलग-अलग परंपराओं में रंगों के निरूपण में भिन्नता मिल सकती है।
आयोजकों ने सभी धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से नवपदजी ओली आराधना, दर्शन-वंदन और प्रवचन का लाभ लेने की अपील की है। प्रथम दिन आराधकों से प्रात: 8 बजे प्रवचन स्थल पर उपस्थित होने का निवेदन किया गया है।