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शुक्रवार, 25 सितम्बर को है अनंत चतुर्दशी व्रत, श्री गणपति प्रतिमा विसर्जन इसी तिथि पर किया जाना चाहिए 

विसर्जन का उपयुक्त समय स्थापना के 11वें दिन अनंत चतुर्दशी का होता है

गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ…

रायपुर। धर्मशास्त्रियों के अनुसार शुक्रवार, 25 सितम्बर को अनंत चतुर्दशी व्रत है और इसी दिन हवन-पूजन कर श्रीगणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। स्नान धर्म परंपरा की पौराणिक मान्यतानुसार श्रीगणेशजी ने ही महाभारत ग्रंथ को लिखा था। महर्षि वेदव्यास ने गणेशजी को लगातार 10 दिनों तक महाभारत की कथा सुनाई और गणेशजी ने 10 दिनों तक इस कथा को हूबहू लिखा। 10 दिनों के बाद वेदव्यासजी ने जब गणेशजी को छुआ तो देखा कि उनके शरीर का तापमान बहुत बढ़ चुका था। वेदव्यासजी ने उन्हें तुरंत कुंड में ले जाकर उनके शरीर के तापमान को शांत किया। तभी से मान्यता है कि गणेशजी को शीतल करने के लिए उनका जल तत्व में विसर्जन किया जाता है।

विसर्जन का अर्थ है मोह से मुक्ति: पंडित मनोज शुक्ला

माँ महामाया मंदिर रायपुर के ज्योतिषी एवं भागवताचार्य पंडित मनोज शुक्ला महाराज ने बताया कि विसर्जन का नियम इसलिए है कि मनुष्य यह समझ ले कि संसार एक चक्र के रूप में चलता है भूमि पर जिसमें भी प्राण आया है वह प्राणी अपने स्थान को फिर लौटकर जाएगा और फिर समय आने पर पृथ्वी पर लौट आएगा। विसर्जन का अर्थ है मोह से मुक्ति, आपके अन्दर जो मोह है उसे विसर्जित कर दीजिए। आप बप्पा की मूर्ति को बहुत प्रेम से घर लाते हैं उनकी छवि से मोहित होते हैं लेकिन उन्हें जाना होता है इसलिए मोह को उनके साथ विदा कर दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि बप्पा फिर लौटकर आएं, इसलिए कहते हैं गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।

परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक है जल में विसर्जन: पंडित चन्द्रभूषण शुक्ला

संस्कृत भाषा के प्रचारक एवं धर्मशास्त्री पंडित चन्द्रभूषण शुक्ला ने बताया कि सभी देवी-देवताओं का विसर्जन जल में होता है। जल को नारायण रूप माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है संसार में जितनी भी मूर्तियाँ जिनमें देवी-देवता और प्राणी शामिल हैं, उन सभी में मैं ही हूँ और अन्त में सभी को मुझमें ही मिलना है। जल में मूर्ति विसर्जन से यह माना जाता है कि जल में घुलकर परमात्मा अपने मूल स्वरूप से मिल गए। यह परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक भी है।

जल का संबंध ज्ञान और बुद्धि से भी माना गया है जिसके कारक स्वयं भगवान गणेश हैं। जल में विसर्जित होकर भगवान गणेश साकार से निराकार रूप में घुल जाते हैं। जल को पंच तत्वों में से एक तत्व माना गया है जिनमें घुलकर प्राण प्रतिष्ठा से स्थापित श्रीगणेश की मूर्ति पंच तत्वों में समाहित होकर अपने मूल स्वरूप में मिल जाती है।

पंडित मनोज शुक्ला एवं पं. चन्द्रभूषण शुक्ला ने बताया कि हर साल अनंत चतुर्दशी का दिन बप्पा के भक्तों के लिए बेहद खास होता है। गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक पूरे 10 दिनों तक भक्त गणपति को अपने घरों में बैठाते हैं। इस दौरान घरों में लगातार विधिवत पूजा-पाठ चलता रहता है। हालांकि कई बार लोग वक्त की कमी के चलते गणपतिजी की प्रतिमा को डेढ़ दिन, 4 दिन, 5 दिन या 7वें दिन में ही विसर्जित कर देते हैं। लेकिन गणपति विसर्जन का उपयुक्त समय स्थापना के 11वें दिन अनंत चतुर्दशी का होता है।

गणपति विसर्जन की पूजा

विसर्जन के दिन परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ मिलकर आरती करनी चाहिए। आरती में गणपति को 5 चीजें- दीप, फूल, धूप, सुगंध और नैवेद्य आदि चढ़ाए जाते हैं। आरती करने के बाद भगवान गणेश को भोग लगाया जाता है। भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों के बीच बांट दिया जाता है। आरती और प्रसाद के बाद परिवार के सदस्य एकदम धीरे-धीरे गणपति की मूर्ति को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। 

गणपति विसर्जन के नियम

गणपति विसर्जन से पहले विधिवत पूजा-पाठ करके बप्पा को मोदक का भोग लगाएँ। आरती के समय घऱ के सब लोग मिलकर गणेशजी की आरती गाते हुए ‘गणपति बाप्पा मोरया’ के जयकारे लगाएँ। इसके बाद अपने दोनों हाथ जोड़कर अपने मन में बप्पा से क्षमा प्रार्थना करते हुए अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा माँग लें। अब किसी पवित्र जलाशय या कुंड में पूजा की सभी सामग्री के साथ गणपति का विसर्जन कर दें। पॉलीथिन, मिठाई लड्डू के डिब्बे, पत्तल दोना को नदी या तालाब में विसर्जन नहीं करना चाहिए बल्कि इसे कचरे डिब्बे में डालना चाहिए ताकि नदी तालाब की पवित्रता बनी रहे। विसर्जन के नियम है कि जल में देवी-देवताओं की प्रतिमा को डुबोया जाता है। इसके लिए श्रद्धालु नदी, तालाब, कुण्ड, सागर में प्रतिमा को विसर्जित कर सकते हैं। महानगरों में जहाँ नदी, तालाब तक जाना कठिन होता है वहाँ लोग जमीन खोदकर उसमें जल भरकर प्रतिमा को विसर्जित कर लेते हैं। अगर आपके पास छोटी प्रतिमा है तो घर के किसी बड़े बर्तन में भी प्रतिमा विसर्जित कर सकते हैं। बस ध्यान रखना चाहिए कि इस जल में पैर न लगे। इस जल को गमले में भी डाल सकते हैं।

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