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समय से अधिक मूल्यवान कोई वस्तु नहीं, वर्तमान को सार्थक बनाएं: साध्वी सिद्धांत ज्योतिश्री

वैराग्य शतक ग्रंथ के संदर्भ में प्रवचन, श्रद्धालुओं से धर्म-सेवा और पुरुषार्थ का आह्वान

 

रायपुर। धर्म, संयम और सेवा के प्रेरणा स्रोत साध्वी सिद्धांत ज्योतिश्री महाराज ने प्रवचन में समय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय से अधिक मूल्यवान संसार में कोई वस्तु नहीं है। मनुष्य भव अत्यंत दुर्लभ है। इसे केवल सांसारिक कार्यों में न व्यतीत कर धर्म, संयम, सेवा, साधना और सद्कार्यों के माध्यम से सार्थक बनाना चाहिए।

वैराग्य शतक ग्रंथ का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य को शुभ कार्यों को टालना नहीं चाहिए। जो कल करना है, उसे आज करो और जो आज करना है, उसे अभी करो, क्योंकि समय किसी का इंतजार नहीं करता।

उन्होंने कहा कि कालचक्र निरंतर तीव्र गति से चल रहा है। बीता हुआ समय वापस नहीं आता और आने वाला समय हमारे हाथ में नहीं है। हमारे हाथ में केवल वर्तमान का क्षण है, जिसे सार्थक बनाना ही वास्तविक पुरुषार्थ है।

साध्वीश्री ने कहा कि तीर्थंकर परमात्मा भी काल को एक क्षण आगे-पीछे नहीं कर सके, तो सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य ही क्या है। इसलिए जीवन में जो भी शुभ और धार्मिक कार्य है, उसे वर्तमान में ही कर लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब तक घाती कर्मों का नाश नहीं होता, तब तक पूर्ण सुख संभव नहीं है। देवलोक में भी पूर्णता नहीं है। प्रबल पुरुषार्थ करके ही हम मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ सकते हैं। धर्म से जुड़कर धार्मिक क्रियाओं से संपन्न होते हुए निरंतर पुरुषार्थ करना पड़ेगा। साध्वीश्री ने बताया कि धर्म दो प्रकार का होता है दिखावे का और अंतरात्मा का। जो धर्म प्रतिदिन अंतरात्मा से किया जाता है वही मोक्ष की राह पर आगे ले जाता है। यदि पापी आत्मा सोई रहे तो अच्छा है, लेकिन जो आत्मा परोपकार, धर्म और सद्गुणों से भरपूर है, उसे निरंतर जागृत रहना चाहिए।

प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। सभी ने साध्वीश्री के संदेश को जीवन में अपनाने और धर्म-सेवा के पथ पर चलने का संकल्प लिया।

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मीडिया एमपीसीजी