छत्तीसगढ़ धर्म रायपुर

भक्ति भगवान का स्वरूप है: डॉ. स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ

रायपुर। श्रीशंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ महाराज ने शिव पुराण की कथा के प्रसंग को विस्तृत करते बताया कि भक्ति, भगवान का ही स्वरूप है। एक बार पराम्बा भगवती सती ने भगवान शंकर से प्रार्थना की कि मैं धन्य हूं जो आपकी कामिनी और आपके साथ सुंदर विहार करने वाली आपकी प्रिया बनी। प्रभु आप भक्तवत्सल हैं। अपने भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। हे नाथ मैंने आपके साथ बहुत दिनों तक विहार किया है। महेश अब मैं इससे संतुष्ट हो चुकी हूं, आप मेरा उद्धार कीजिए। मैं परम तत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूं जिसको प्राप्त करके व्यक्ति आवागमन के चक्कर में नहीं आता है। भगवान की कृपा से उसे अपने मूल स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। सती की प्रार्थना को सुनकर के भगवान शंकर ने प्रसन्नतापूर्वक कहा कि मैं तुम्हारे समक्ष उस परम तत्व का वर्णन कर रहा हूं, जिसके श्रवण करने मात्र से जीव वासना से मुक्त हो जाता है। मेरी भक्ति ही जीव की मुक्ति का परम कारण है। भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। भक्त और ज्ञानी दोनों को ही सदा सुख प्राप्त होता है। मैं नवधा भक्ति का वर्णन कर रहा हूं, आप सावधान होकर के श्रवण करें। इस प्रकार से भगवान शिव ने भगवती सती को नवधा भक्ति का उपदेश दिया।

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