नव-छत्तीसगढ़ साहित्य सांस्कृतिक संस्थान ने सजाई काव्य संध्या
युवा लेखक कमलेश साहू की पुस्तक ‘यात्रा अनुभूति’ का विमोचन
रायपुर। नव छत्तीसगढ़ साहित्य, सांस्कृतिक संस्थान रायपुर के द्वारा काव्य गोष्ठी एवं पुस्तक विमोचन का साहित्यिक आयोजन वृंदावन हाल रायपुर में किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाषा विद् डॉ. चितरंजन कर रहे। अध्यक्षता लेखक व कवि संजीव कुमार ठाकुर ने की। साहित्यकार डॉ. माणिक विश्वकर्मा विशिष्ट वक्ता और डॉ. सीमा रानी प्रधान, कवि सुरेंद्र रावल, कवि रामेश्वर शर्मा विशिष्ट अतिथि रहे।
दो सत्रों में विभाजित इस आयोजन के प्रथम सत्र में युवा लेखक कमलेश साहू की यात्रा वृत्तांत पर आधारित पुस्तक ‘यात्रा अनुभूति’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर लेखक कमलेश साहू ने बताया, ‘यात्रा अनुभूति’ में उन्होंने अपने विभिन्न यात्रा अनुभवों और अनुभूतियों को पुस्तक के रूप में अभिव्यक्त किया है।
द्वितीय सत्र रायपुर एवं सुदूर अंचलों से आये हुए कवियों के बहुरंगी रचनाओं से सराबोर रहा। हिंदी और छत्तीसगढ़ी की समसामयिक, हास्य-व्यंग, श्रृंगार एवं जीवन के रसों से परिपूर्ण रचनाओं ने काव्य संध्या में अपने रंग भरे।
अंचल के लोकप्रिय कवि यशवंत यदु की एक बानगी देखिए …
पितर में कौआ सगा बनके आगे, धन हमर भाग जागे। जीअत ले ददा ला नई देवे कभू पानी, कौआ बर मेवा मिष्ठान आनी बानी।।
कविगोष्ठी में प्रस्तुत कुछ रचनाओं की झलकियां-
- नाद ब्रह्म को अक्षर अक्षर, ढूंढ रहा हूं। छूटा मां का आंचल और पिता की उंगली, तब से लेकर अब तक, मैं घर ढूंढ रहा हूं।। डॉ. चितरंजन कर
- आओ फिर लौट चलें, जंगल की ओर। करते हैं नृत्य जहां, मस्ती में मोर।। डॉ. मानिक विश्वकर्मा
- प्रभु,पीड़ा मेरे अंदर पलने देना, आग हृदय में जलने देना। राख नहीं बनना मुझे, जब तक मन न धुल जाए आंखों की गंगा में।जीने की ललक बनाये रखना।। डॉ. सीमा प्रधान
- नशे से दूर रहना,, सुनो भाई सुनो कहना। ये घर का नाश करता है, सभी का है कहना।। राजेन्द्र रायपुरी
- मैं हंव अड़हा किसान रे संगी, बनी भूती करके मैं रहथौं। बूता नई जानौं आन रे संगी। मैं हंव अड़हा किसान।। छबिलाल सोनी
- समय की दौलत का जब भी, बंटवारा होता है। रात के हिस्से में अक्सर,अंधियारा होता है।। यशवंत चतुर्वेदी
- अपनी जरूरत के हम सारे जतन कर रहे हैं। कांक्रीट के नीचे जमीन को दफन कर रहे हैं।। सुनील पाण्डेय
- कुछ सपने धूप में लंबे थे, कुछ अरमान अधूरे थे। कुछ अपनों की भीड़ में भी, हम भीतर से अकेले थे।। मंजूषा अग्रवाल
- तुम पर निसार सारे अरमान, वो एक मेरा अरमान तुम हो। बिटिया मेरी जान, मेरी जान तुम हो।। बलजीत कौर
- जिंदगी को कुछ अपनी सरल कीजिए। है सघन यह बहुत विरल कीजिए।। सीमा पाण्डेय
- कतका भाव बढ़े हे संगी, सोना कहां बिसाबो। मुंह फूला के मनखे ले जी, कइसे घला हिसाबों।। पल्लवी झा
- रमजान के तीस रोजे के बाद ईद आई है, शकीला अम्मी की सेवाइयां बहुत याद आई हैं।। शकुन्तला तिवारी
- आंखों में तो आंसू, कैसे तुमको देखूं मां। मन में तो संताप भरा है, कैसे मैं मुस्काऊं मां।। रूनाली चक्रवर्ती
- बस से उतर गौरीकुंड से जब, चलना प्रारंभ किया। सामान का थैला हाथों में, आंखों में सुंदर सपना सजा लिया।।कल्याणी तिवारी
- पितर में कौआ सगा बनके आगे, धन हमर भाग जागे। जीअत ले ददा ला नई देवे कभू पानी, कौआ बर मेवा मिष्ठान आनी बानी।। यशवंत यदु
- कठिन लड़ाई लड़के पायेंन, भारत के आजादी। हम धरती के बेटा आवन, देश हमर महतारी।। मन्नूलाल यदु
इस अवसर पर बोलते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष स्तंभकार, कवि, लेखक संजीव ठाकुर ने कहा, किसी पुस्तक को लिखना और उसे सार्वजनिक रूप से पाठकों के लिए लोकार्पित करना, लेखक के लिए एक नन्हे शिशु को जन्म देने जैसा अनुभव है। यात्रा में यदि कष्ट ना हो तो यात्रा कैसी, कष्टप्रद यात्रा के भी संस्मरण मीठे तथा सुखद होते हैं। यात्रा वृतांत लिखने वाले देश में बहुत कम लेखक हैं उनमें प्रमुख रूप से राहुल सांकृत्यायन-अज्ञेय, निर्मल वर्मा, महादेवी वर्मा, डॉ. फणीश्वर नाथ रेणु ऐसे अग्रणी नाम हैं जिन्होंने यात्रा वृतांत का बखूबी वर्णन किया है। विदेश में नोबेल पुरस्कार प्राप्त बी.एम. नेपाल, फाह्यान, मार्को पोलो, अल बरुनी हुए हैं। वैसे यात्रा वृत्तांत लेखन एक तकनीकी विधा है इसमें स्थान, दृश्य, व्यक्ति, संस्कृति, इतिहास, अनुभव आत्मचिंतन, आत्मावलोकन निष्कर्ष के साथ साहित्यिक विधा में इसका पूर्ण वर्णन किया जाना चाहिए उन्होंने लेखक को बधाई देते हुए शुभकामनाएं दीं।
डॉ. मानिक विश्वकर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में इस पुस्तक के विभिन्न आयामों की समीक्षा की और कहा कि लेखक यात्रा वृतांत लिखने में सरल शैली में काफी हद तक सफल हुए हैं।
डॉ. चितरंजन कर ने साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं सरल लेखन कला के सूक्ष्म बिंदुओं पर अपने मार्गदर्शक विचार रखे। उन्होंने कहा केदारनाथ से लेकर बस्तर तक की यात्रा का वर्णन कमलेश साहू की लेखन कला का कौशल है। इस कौशल को वे लगातार उत्तरोत्तर आगे बढ़ते रहेंगे, ऐसी आशा तथा शुभकामनाएं हैं।
इस कार्यक्रम में भूपेंद्र शर्मा, विजय मिश्रा, डॉ. पूनम साहू, डॉ. जगदीश साहू, सुरेंद्र रावल, विवेक रहटगावकर, शकुंतला तिवारी, पल्लवी रावटे, बी.डी. रावटे, अनिता झा, डॉ. लोकेश्वर प्रसाद सिन्हा, टीकेश्वर सिंह मरकाम, महेंद्र पटेल, तरूण साव, रविश गुप्ता, माधुरी कर, डॉ. उदयभान सिंह, आनंदराम साहू, राधेश्याम बंसल, अंजना केरकेट्टा ने भी काव्य पाठ किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का सफल एवं सारगर्भित संचालन शशांक खरे एवं विजय मिश्रा द्वारा किया गया। अंत में डॉ. उदयभान सिंह चौहान ने समस्त रचनाकारों एवं काव्य रसिक श्रोताओं का आभार प्रदर्शन किया।



