जो रोज महाप्रसाद का एक तिनका भी ग्रहण करते हैं वो सीधे महाप्रभु के चित्त को धारण करते हैं…
रायपुर। कृषि उपज मंडी देवेंद्रनगर के प्रांगण में श्रीमद् भागवत ज्ञानयज्ञ के द्वितीय दिवस कथा के माध्यम से प्रसिद्ध भागवताचार्य इंद्रेश महाराज पर्यावरण के प्रति बड़ा संदेश व्यासपीठ से दे गए। उन्होंने कहा कि बृजलीला के द्वारा ठाकुरजी पंच तत्वों के प्रति जागरुकता फैला रहे हैं, उन्ही पंच तत्वों- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश से हमारा शरीर बना है। भगवान ने पृथ्वी के संरक्षण के लिए हमें भेजा है लेकिन हम उसी पृथ्वी का नाश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, भारत में हम लोग पवित्रता पर तो ध्यान दे रहें लेकिन स्वच्छता पर नहीं। पवित्रता भगवान की पत्नी हैं, उन्हें पवित्र रखना भी हमारा धर्म है। आज तो वृंदावन के यमुना में आचमन तक करना मुश्किल हो गया है इतना विषैला हो गई है वहां का जल। वहां से विषैले कालिया नाग को भगाने के लिए भगवान ने उसका वध किया था, लेकिन ‘आज के कालिया नाग’ यमुना क्या, अन्य नदियों को भी विषैला कर रहे हैं। विषय आप समझ सकते हैं। मिट्टी खाकर भी परमात्मा ये संदेश दे रहे हैं कि पर्यावरण से उन्हें कितना प्रेम हैं। भारत में यदि पवित्रता के साथ स्वच्छता पर हम सब ध्यान देने लगें तो यह स्वर्ग से सुंदर हो जायेगा। भागवत का उद्देश्य परम धर्म है, ठाकुर से संबंध मांगकर प्रेम स्थापित करिए। वैसे ही पर्यावरण की रक्षा करना भी हमारा धर्म है, पर्यावरण से प्रेम रखिए।
कथा की शुरूआत करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल कुछ लोग तो गीत गोविंद को लेकर ही कुछ भी बातें करने लगे हैं, अनर्गल प्रमाण देने का स्वभाव बन गया है। सनातन धर्म के बड़े लोग आवाज नहीं उठा रहे हैं इसलिए आज हमें पूर्व आचार्यों के शरणों में जाना होगा। जयदेव महाप्रभु से लेकर जगन्नाथ भगवान तक की कुछ भक्तिगीतों के बोल सुनाते हुए उन्होंने …श्री राधे कृष्ण हरि गोविंद गोपाला, नंदजी को लाला-यशोदा को लाला। जय जगन्नाथ-जय जगन्नाथ..। जय जय राधे… जैसे भजनों का मधुर गायन सुनाकर श्रद्धालुओं भक्तिभाव से ओतप्रोत कर दिया।
महाराजश्री ने बताया कि जगन्नाथ प्रभु आज श्राद्ध रूप में हैं, उनकी महिमा पर व्याख्या करते आगे उन्होंने बताते हुए कहा कि पितरों के प्रति जो श्रद्धा होती है उसे ही श्राद्ध कहते हैं। हमारे बड़े-बुजुर्ग जो अब इस दुनिया में नहीं रहे, फिर भी वे अपनी परिवार की रक्षा के लिए खड़े रहते हैं। परिवार में किसी भी प्रकार के कष्ट या विपत्ति को आने से रोकते हैं। यहां भी कथा के अंतिम दिवस के आते-आते श्राद्ध पक्ष शुरू हो जाएगा। आप भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करिए जो भी नियम हैं। अपनी सनातन परम्परा को मत भूलिए। इस कथा में भगवान जगन्नाथ स्वयं विराजित हैं इसलिए वे तो कहते हैं इस कथा को ‘जगन्नाथ रायपुर आगमन महोत्सव’ नाम दे देना चाहिए। महाप्रसाद बनने से लेकर भोग अर्पण और वितरण तक का बहुत सुंदर वर्णन उन्होंने आज की कथा में किया। उन्होंने बताया कि एकादशी व्रत करने वाले व्रतधारी तक भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। स्कंध पुराण में महाप्रसाद की महिमा बताते हुए कहा गया है कि जो लोग रोज महाप्रसाद का एक तिनका भी ग्रहण करते हैं वो सीधे महाप्रभु के चित्त को धारण करते हैं। ध्यान रखें जिस दिन से महाप्रसाद ग्रहण कर लिया कुछ भी अनर्गल नहीं करना नहीं तो अपराध लगेगा। जैसे मांस-मदिरा व गलत कार्यों से दूर रहें। कथा के पांचवे दिन यहां भी महाप्रसाद का वितरण होगा और संभवत: पहली बार होगा कि इतने सारे वैष्णवों को एक साथ महाप्रसाद रायपुर में बंटेगा। उन्होंने आयोजकों से जगन्नाथपुरी से महाप्रसाद मंगवाने कह दिया है। तब तक बस हम सब गाते रहें-
जगन्नाथ.. तू न संभालें तो हमें कौन संभाले…। इस भक्तिगीत पर पूरे कथा स्थल में श्रद्धालुजन नृत्य करते हुए भक्तिरस में गाते लगाते रहे।
आज प्रवर्तनीय एकादशी है, आज निद्रालीन ठाकुरजी करवट ले रहे हैं…
महाराजजी ने आगे कहा, आज की तिथि में एकादशी है, उसे प्रवर्तनीय एकादशी कहते हैं इस दिन ठाकुरजी करवट ले रहे हैं। प्रसंगवश उन्होंने ये भी बताया कि जो जीवनभर ठाकुर के लिए जीते हैं उनकी अंतिम विदाई भी इस दुनिया से विशेष दिन में ही होती है जैसे कि- एकादशी। आज लोग मनोकामना पूर्ण के लिए व्रत करने लगे हैं, इसे स्वार्थभक्ति कहते हैं। अन्न, जल, पादुका जैसे और भी चीजों का त्याग करते हैं, लेकिन क्या ठाकुर अनभिज्ञ हैं वे सब जानते हैं।
प्रभु की कृपा से होगा महाप्रसाद का वितरण
कथा के आयोजक गुंजन प्रजापति ने इस प्रसंग पर बताया कि व्यासपीठ के आशीर्वाद व जगन्नाथ प्रभु की कृपा से महाप्रसाद के वितरण का कार्य निश्चि रूप से पूरा होगा। श्रद्धालुजनों ने तालियां बजाकर इसका स्वागत किया। प्रजापति परिवार के सदस्यों ने कथा प्रारंभ होने से पूर्व व्यासपीठ की आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
संतजनों की रही विशेष उपस्थिति
कथा श्रवण करने के लिए मंगलवार को काफी संख्या में संतजन पहुंचे थे। इन्द्रेश महाराज के पिताश्री कृष्ण चंद्र शास्त्री (ठाकुरजी) महाराज भी वृंदावन से पहुंचे। व्यासपीठ से उनका स्वागत किया गया। श्रद्धालुओं को इन्द्रेश महाराज ने उनका परिचय सद्गुरुदेव के रूप में कराया।
शदाणी दरबार पहुंचे कथा वाचक महाराज
कथावाचक इंद्रेश महाराज मंगलवार को शदाणी दरबार तीर्थ पहुंचे, यहां उन्होंने दर्शन-वंदन कर दरबार के संत डॉ. युधिष्ठिर लाल सहित तीर्थ ट्रस्टियों, पदाधिकारियों व सभी श्रद्धालुओं से भेंटवार्ता की। इस प्रसंग पर सिंधी काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष ललित जैसिंघ, दरबार तीर्थ के सचिव उदय शदाणी व काउंसिल के उपाध्यक्ष धनेश मटलानी ने उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।