अन्न का त्याग उपवास, कषायों का त्याग ही वास्तविक तप: भाई सुरेश मोदी
रायपुर। दिगंबर जैन समाज के पावन 10 दिवसीय दशलक्षण महापर्व के सप्तम दिवस कचना स्थित अमलतास कैसल परिसर के 1008 मुनि सुब्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर में ‘उत्तम तप धर्म’ की श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक आराधना की गई। धार्मिक आयोजन के दौरान श्रीजी को पाण्डुक शिला पर विराजित कर अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके पश्चात नित्य पूजन एवं दशलक्षण विधान की आराधना में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। इस अवसर पर शैलेन्द्र-अक्षत जैन परिवार एवं डॉ. अमित-नेहा जैन परिवार को श्रीजी की शांतिधारा करने का पुण्य अवसर प्राप्त हुआ।
उत्तम तप धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए भाई सुरेश मोदी ने कहा कि तप का महत्वपूर्ण साधन उपवास अथवा व्रत है, लेकिन तप की वास्तविक सार्थकता केवल भोजन का त्याग करने में नहीं है। मनुष्य के भीतर विद्यमान क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का त्याग ही तप की उच्च अवस्था है। उन्होंने कहा कि अन्न का त्याग उपवास है, जबकि कषायों का त्याग वास्तविक तप है। उन्होंने कहा कि तप का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं पर संयम रखते हुए आत्मा को निर्मल बनाना है। जब मनुष्य बाहरी तप के साथ अपने भीतर के विकारों और कषायों को दूर करने का प्रयास करता है, तभी तप आत्मशुद्धि का माध्यम बनता है। उत्तम तप हमें संयम, त्याग और आत्मनिरीक्षण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
मंदिर के अध्यक्ष हिमांशु जैन ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान प्रतिदिन विभिन्न उत्तम धर्मों की आराधना, पूजन एवं धार्मिक कार्यक्रम श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आयोजित किए जा रहे हैं।



