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गांड़ा समाज के जाति प्रमाण-पत्र का संघर्ष पहुंचा दिल्ली

  • राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय में सौंपा ज्ञापन

  • 1950 के पुराने राजस्व रिकॉर्ड की अनिवार्यता से राहत और जाति प्रमाण-पत्र प्रक्रिया के सरलीकरण की उठाई मांग

  • जाति प्रमाण पत्र आरक्षण की पहली सीढ़ी, जाति प्रमाण पत्र के सामाजिक हक के बिना न्याय अधूरा — भगवानू

नई दिल्ली/रायपुर, 21 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के गांड़ा समाज को जाति प्रमाण-पत्र बनवाने में आ रही कठिनाइयों का मामला अब देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गया है। राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज के संस्थापक अधिवक्ता भगवानू नायक, राष्ट्रीय प्रभारी बनमाली छुरा एवं युवा नेता आशीष तांडी ने आज नई दिल्ली में राष्ट्रपति कार्यालय एवं प्रधानमंत्री कार्यालय में विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ में गांड़ा अनुसूचित जाति के पात्र परिवारों के लिए जाति प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया को सरल, व्यावहारिक एवं एकरूप बनाने की मांग की।

राष्ट्रीय नेतागण अधिवक्ता भगवानू नायक, बनमाली छुरा और आशीष तांडी ने कहा गांड़ा समुदाय अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित है, इसके बावजूद समाज के अनेक परिवारों को पुराने राजस्व अभिलेख उपलब्ध नहीं होने के कारण स्थायी सामाजिक प्रास्थिति/जाति प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के 10 जून 2025 के परिपत्र को छत्तीसगढ़ में प्रभावी रूप से लागू कराया जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी वास्तविक पात्र परिवार का आवेदन केवल पुराने राजस्व दस्तावेज की अनुपलब्धता के आधार पर स्वतः समाप्त न हो। लागू नियमों के अनुसार वंशावली, जन्म-मृत्यु संबंधी अभिलेख, शैक्षणिक रिकॉर्ड तथा अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों की भी समुचित जांच की जाए।

हाईकोर्ट के फैसले हवाला देते हुए प्रतिवेदन में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के Sachin Jamgade v. State of Chhattisgarh, WPC No. 3428/2026, आदेश दिनांक 03 जुलाई 2026 का विशेष उल्लेख किया गया है। नेताओं ने कहा कि उक्त प्रकरण में उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के 10 जून 2025 के परिपत्र पर विचार करते हुए सक्षम अधिकारी को संबंधित आवेदन पर पुनर्विचार कर 60 दिनों के भीतर कारणयुक्त एवं स्पष्ट आदेश (reasoned and speaking order) पारित करने का निर्देश दिया था। समाज के नेताओं ने ज्ञापन में स्पष्ट किया कि इस न्यायिक आदेश का आशय प्रत्येक आवेदन में स्वतः जाति प्रमाण-पत्र जारी करना नहीं है, बल्कि यह इस बात को रेखांकित करता है कि सक्षम प्राधिकारी को केंद्रीय परिपत्र एवं उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर कानून के अनुसार आवेदन पर विचार करना चाहिए।“दस्तावेज के अभाव में अधिकार से वंचित करना गंभीर विषय है।”

राष्ट्रीय गांड़ा महासमाज के संस्थापक अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा “गांड़ा समाज के गरीब परिवारों के लिए जाति प्रमाण-पत्र केवल एक कागज नहीं है। इससे बच्चों की शिक्षा, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा में प्रवेश, सरकारी रोजगार और आरक्षण सहित अनेक संवैधानिक एवं वैधानिक अवसर जुड़े हुए हैं। लगभग सात दशक पुराने राजस्व दस्तावेज किसी परिवार के पास उपलब्ध नहीं होने मात्र से वास्तविक पात्र परिवार के लिए इन अवसरों तक पहुंच बाधित होना सामाजिक न्याय की दृष्टि से गंभीर विषय है।” उन्होंने राज्य गठन के समय निवास के मामलों पर स्पष्ट नीति की मांग की गई है कि 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के समय छत्तीसगढ़ क्षेत्र में निवासरत परिवारों और वर्तमान में भी यहां निवास कर रहे पात्र आवेदकों के मामलों का परीक्षण केंद्र सरकार के 10 जून 2025 के निर्देशों के अनुरूप किया जाए। उन्होंने केंद्र सरकार से यह भी मांग की कि छत्तीसगढ़ शासन को सभी कलेक्टरों, एसडीएम तथा जाति प्रमाण-पत्र जारी करने वाले सक्षम अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट और एकरूप SOP/शासनादेश जारी करने के लिए कहा जाए, ताकि अलग-अलग जिलों में अलग-अलग प्रक्रिया के कारण पात्र परिवारों को परेशानी न उठानी पड़े। पूर्व में अस्वीकृत मामलों को भी मिले पुनः परीक्षण का अवसर समाज के नेताओं ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री कार्यालय को दिए प्रतिवेदन में यह मांग भी रखी कि जिन पात्र आवेदकों के आवेदन पूर्व में केवल पुराने राजस्व अभिलेख की अनुपलब्धता के कारण अस्वीकृत हुए हैं, उन्हें कानून एवं लागू नियमों की सीमा में पुनः परीक्षण का अवसर दिया जाए। इसके साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से मामले का संज्ञान लेकर छत्तीसगढ़ शासन से Action Taken Report प्राप्त करने तथा केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से अपने 10 जून 2025 के निर्देशों के अनुपालन की स्थिति की समीक्षा करने की मांग की गई है।

राष्ट्रीय प्रभारी बनमाली छुरा ने कहा कि गांड़ा समाज वर्षों से जाति प्रमाण-पत्र की समस्या का सामना कर रहा है। समाज का उद्देश्य किसी अपात्र व्यक्ति को लाभ दिलाना नहीं, बल्कि वास्तविक पात्र परिवारों को अनावश्यक दस्तावेजी कठिनाइयों के कारण उनके अधिकारों से वंचित होने से बचाना है। उन्होने कहा कि नई पीढ़ी शिक्षा और अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। जाति प्रमाण-पत्र के अभाव का सबसे अधिक प्रभाव विद्यार्थियों और रोजगार की तैयारी कर रहे युवाओं पर पड़ता है, इसलिए इस समस्या का स्थायी समाधान आवश्यक है।

युवा प्रभारी आशीष तांडी ने कहा कि दिल्ली में राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी बात पहुंचाना इस अभियान का महत्वपूर्ण चरण है। संगठन अब इस विषय को संबंधित संवैधानिक संस्थाओं एवं सक्षम विभागों के समक्ष भी तथ्यात्मक और कानूनी आधार पर उठाता रहेगा।

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