शिव नाम से समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं: डॉ. इंदुभवानंद तीर्थ महाराज
शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रही शिवपुराण की दिव्य अमृतमयी कथा
रायपुर। शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रही चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के क्रम में शिवपुराण की दिव्य अमृतमयी कथा की व्याख्या करते हुए आश्रम के प्रभारी डॉ. इंदुभवानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि शिव नाम से प्राणियों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जिसके मुंह में भगवान शिव का नाम रहता है अथवा जो भक्त भगवान शंकर का नाम जपता रहता है, उस भक्त के दर्शन करने मात्र से प्राणियों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो भगवान शिव का भक्त है, उसके गले में रुद्राक्ष की माला , मस्तक में भस्म तथा मुख में शिव नाम होता है तो उसके दर्शन करने से त्रिवेणी स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।
महाराजश्री ने आगे कहा, पाप मूलक नाना प्रकार के दु:ख एकमात्र शिव नाम के लेने से नष्ट हो जाते हैं। दूसरे अन्य साधनों से संपूर्ण यत्न करने के बाद भी पाप और पाप की वासना नष्ट नहीं होती है परंतु भगवान शंकर के नाम लेने से जीव की पाप एवं पाप की वासना भी नष्ट हो जाती है। भगवान शंकर को ‘हर’ बोलते हैं, ‘हर’ का मतलब है जो पाप की वासना को भी नष्ट कर दे। भगवान शंकर के नाम लेने से व्यक्ति के पाप करने की प्रवृत्ति ही समाप्त हो जाती है। बड़े से बड़े पापियों में उतने पाप करने की सामर्थ नहीं है जितना कि भगवान शिव के नाम में पाप निर्वृत्त (नष्ट) करने की शक्ति है। शिव नाम रूपी नौका पर सवार होकर के व्यक्ति संसार सागर को सहज ढंग से ही पार हो जाता है। संसार के मूलभूत पातक रूपी वृक्ष का शिव नाम रूपी कुठार से निश्चय ही नाश हो जाता है। जो पाप रूपी दावानल से पीड़ित है उन्हें शिव नाम रूपी अमृत का पान करना चाहिए। पापों के दावानल से दग्ध होने वाले लोगों को इस शिवनाममृत के बिना शांति नहीं मिल सकती है। जो शिव नाम रूपी सुधा की वृष्टिजनित धारा में गोता लगाते हैं, वे संसार रूपी दावानल के बीच में खड़े होने पर भी कदापि शोक के भागी नहीं होते हैं। जिन महात्माओं के मन में शिव नाम की प्रति बड़ी भक्ति है, आदर है, ऐसे लोगों की सहज मुक्ति हो जाती है। जिसने अनेक जन्मों तक तपस्या की है उसी की शिव नाम के प्रति भक्ति होती है। कथा के पूर्व समस्त भक्तों ने मिलकर शिवपुराण पोथी का पूजन किया तथा संस्कृत विद्यालय के छात्रों ने वेद पाठ संपन्न कराया।



