रायपुर। प्राच्य संस्कृत विद्यालय संघ छत्तीसगढ़ एवं संत समिति रायपुर महानगर की बुधवार को एक संयुक्त बैठक सुरेश्वर महादेव पीठ खम्हारडीह में हुई। जिसमें प्रमुख रूप से संस्कृत के संरक्षण-संवर्धन पर चर्चा करते हुए शासन-प्रशासन से इस दिशा में संस्कृत के शिक्षकों के लिए हितकारी योजनाएं संचालित करने का अनुरोध किया गया। इस अवसर पर संतों ने कहा कि दिव्य संस्कृत भाषा, अन्य भाषाओं में मुख्य और मधुर है। यह भारत की संस्कृति की परिचायक है। प्राचीन ग्रंथ, वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों सहित ज्ञान, विज्ञान, साहित्य कला आदि साहित्यों की रचना संस्कृत भाषा में हुई है। यह पावन और पवित्र भाषा जिससे भारत की आत्मा जुड़ी है, इसके ज्ञान के माध्यम से प्राचीन जीवन मूल्यों का अनुसरण संभव है। संस्कृत न केवल भारतीय भाषाओं की प्रत्युत संसार की अन्यान्य भाषाओं की जननी मानी जाती है। देश की एकता-अखंडता की रक्षा में संस्कृत का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। किसी भी देश की आत्मा वहां की संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति संस्कृत भाषा में सन्निहित है। संस्कृत के संरक्षण-संवर्धन की प्रक्रिया में जुड़कर जन-जन तक इसका प्रचार-प्रसार करना एक स्तुत्य कार्य है।
इस महती बैठक में स्वामी परमात्मानंद महाराज, भारत सेवा आश्रम के संत स्वामी शिवरुपानंद, शदाणी दरबार के महंत डॉ. युधिष्ठिर लाल महाराज, श्रीबीरंची नारायण मंदिर के महंत स्वामी देवीदास, लक्ष्मीनारायण मठ के महंत डॉ. स्वामी वेदप्रकाशाचार्य, सुरेश्वर महादेव पीठ के संस्थापक डॉ. स्वामी राजेश्वरानंद, किन्नर अखाड़ा महामंडलेश्वर साध्वी सौम्या, आजीवन निराहार संत स्वामी गौतमानंद, महंत सौरभ दास, महामंडलेश्वर जीतेश्वरानंद महाराज, नाथ संप्रदाय के छग प्रांत प्रमुख भारतनाथ योगी, भागवताचार्य गण मोहन महाराज, पं. सत्यनारायण तिवारी, पं. रवीन्द्र शास्त्री, पं. दिलेश शास्त्री, पं. हिमांशु शास्त्री व भूषण साहू सम्मिलित थे।